आवाज़ अर्चना चावजी लेख :हरकीरत ' हीर
पहचानो .... अपनी लहुलुहान होती आत्मा की आवाज़ ....…हरकीरत ' हीर
BayaN ho jayega sub kuch zaban-e bezabaanee se, Bus itni shart' hai pal bhar ko tou bhi bezabaN ho ja. Jawaid
बच्चे सभी को प्यारे लगते हैं परन्तु यदि वे उदार भी हों तो और अधिक अच्छे लगने लगते हैं।
क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने बच्चे की कन्जूसी पर चिन्तित हुए हों? और आप ने यह सोचा हो कि इसे किस प्रकार उदार बनाया जा सकता है? विशेषकर कि जब आप स्वंय उदारवादी हों।
अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे उदारता को अपने माता- पिता से सीखते हैं। जो बच्चे उदार परिवार में बड़े होते हैं वे निश्चित रूप से यह सीख लेते हैं कि किस प्रकार अपने मित्रों या सहकर्मियों के साथ उदारता पूर्ण व्यवहार करें और दूसरों की सहायता करें और किसी की धन सम्पत्ति पर निगाहें न गाड़े। यध्यपि आज के स्वार्थी और क्रूर विश्व में हम मनुष्यों को अपनी विभूतियों का मूल्य ज्ञात होना चाहिए परन्तु उनको ग़रीब लोगों के साथ बॉंट कर हम जीवन का अधिक आनन्द उठा सकते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि हम इस स्वार्थी विश्व में अपने बच्चों को किस प्रकार से दयालु और उदार बना सकते हैं?
यद्यपि वर्तमान युग में बच्चों को यह सिखाना बहुत कठिन है परन्तु असम्भव नहीं है।उदार और अपनी चीज़े दूसरों को देने वाले बच्चे केवल अपने हित के बारे में ही नहीं सोचते बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों तथा मित्रों को भी महत्व देते हैं। इन बच्चों ने सीखा है कि उदारता तथा भलाई से दूसरों को हर्ष प्राप्त होता है। बच्चों को उदारता सिखाने के लिए माता – पिता को चाहिए कि बचपन से ही उन्हें सामूहिक जीवन का महत्व बताएं और उन्हें यह बताएं कि कोई भी मनुष्य जीवन में अकेला नहीं रह सकता। जब भी कोई भलाई करता है तो न केवल यह कि वो स्वंय को पहले से अधिक सक्षम पाता है बल्कि उसमें आत्म सम्मान की भावना भी पनपती है। अधिकॉंश बच्चे लगभग ३ वर्ष की आयु से ही अपनी समरस्ता तथा दया की भावना का प्रदर्शन करने लगते हैं।
यही वो समय है कि जब बच्चा उदारता की भावना को सीखता है।उदार तथा दयालु बच्चे शीघ्र यह सीख लेते हैं कि अपने खाने की वस्तुओं, कपड़ों तथा खिलौनों को अपनी आयु के दूसरे बच्चों के साथ बाटना चाहिए। इस प्रकार वे मित्रता तथा सामाजिक संबंधों को विकसित करते हैं। अलबत्ता याद रखिए कि जो चीज़ें बच्चों को बेहद प्रिय हैं उन्हें दूसरों को देने पर उन्हें कभी विवश न करें।
अधिकांश बच्चे अपनी चीज़ों को दूसरों के साथ बॉंटने में रूचि रखते हैं परन्तु यदि स्वंय इसके लिए पहल करें तो हमें उनकी सहायता करनी चाहिए।सभी बच्चे स्वाभविक रूप से एक विशेष आयु में अपने खिलौने तथा चीज़ें दूसरों को नहीं देते हैं। इस लिए उस समय तक धीरज रखिए जब अचित समय आ पहुंचे। अधिकॉंश लोग यह समझते हैं कि बच्चे ३,४ वर्ष की आयु तक बहुत से मामलों को ठिक से नहीं समझते हैं।
साधारणत: १८ महीने से कम के बच्चे अपनी चीज़ें दूसरों को दे देते हैं परन्तु फिर उसे वापस ले लेते हैं। वस्तुत: इस आयु में बच्चों को अपनी चीज़ों में दूसरों को भागीदार बनाने के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता। आप उसके हाथ में चीज़ें दें और उसे वापस लेकर बच्चे की प्रतिक्रिया देखें। बच्चा जैसे ही स्वामित्व का अर्थ समझ लेगा अपनी चीज़ वापस नहीं करे गा। यदि अपने बच्चे से पूछे बिना आप अपने बच्चे के खिलौने अपने अतिथि के बच्चे को दे देंगे तो उसे बहुत बुरा लगेगा। परन्तु यही काम यदि उससे पूछ कर और उसकी इच्छा से किया जाए तो बच्चा एक प्रकार के अमिभान का आभास करेगा और प्रसन्न होगा।
बच्चे धीरे धीरे दूसरों की भावनाओं तथा स्नेह को समझने लगते हैं और उनका सम्मान करते हैं। परन्तु उद्देश्य पूर्ण तथा सुव्यवस्थित प्रशिक्षण द्वारा उनमें शिष्टाचारिक गुणों का पोषण किया जा सकता है।
श्रीमती टिप्पणी से इश्क ब्लोगर के लिए कोई नया नहीं है और इसके इश्क मैं बड़े बड़े बेकार बर्बाद हुए. श्रीमती टिप्पणी जी के ऊपर बड़े लेख लिखे जा चुके हैं और ब्लॉग जगत इसकी चाहत मैं न जाने क्या क्या क्या क्या करता रहता है. कुछ ब्लोगर तो साफ़ साफ़ कहते हुए मिले की जब वो खुद ५० लोगों के ब्लॉग पे जा के टिप्पणी कर आते हैं तब कहीं जा के ४० टिप्पणी का इंतज़ाम खुद की पोस्ट के लिए हो पाता है.
यह भी सत्य है की एक से एक बेहतरीन लेख इस ब्लॉगजगत मैं केवल २-४ टिप्पणी ही पाते हैं और कुछ जगहों पे एक फूहड़ पोस्ट SMS JOKE की १२५ टिप्पणी पा जाया करती है.मैंने सुना था की पैसा पैसे को खींचता है और सच भी यही है ठीक उसी तरह से यह भी पाया की टिप्पणी टिप्पणी को खींचती है. क्यों की कुछ ऐसे भी ब्लोगर मैं जो दूसरों की नजर मैं आने के लिए वहां टिप्पणी कर आते हैं जहाँ अधिक लोग टिप्पणी कर रहे हैं.
इस असंतुलन का कारण मुझे यह दिखा की एक ब्लॉगजगत मैं वो लोग हैं जो सच मैं लिखते बहुत अच्छा हैं लेकिन उनके पास या तो इतना समय नहीं या उनकी पहुँच नहीं उतने ब्लोगर तक की वो वहाँ जा के टिप्पणी करें. ऐसे मैं उनके ब्लॉग पे भी लोग टिप्पणी नहीं करते.दुसरे वोह लोग हैं जिनके पास समय भी है, और कम से कम १५-२० ऐसे ब्लोगर को वो पहचान गए हैं, जो रोजाना ब्लॉगजगत मैं घुमते हैं. इनके लिए कुछ भी लिखके ५० टिप्पणी का इंतज़ाम करना बड़ा आसान हुआ करता है.
यहाँ यह अवश्य कह दूं कि समूह बना के टिप्पणी करना एक अच्छा काम है, रिश्ते अच्छे बनते हैं लेकिन इन रिश्तों का इस्तेमाल दुसरे ब्लोगर के खिलाफ करना निंदनीय है.
यह असंतुलन शायद ब्लॉगजगत की तरक्की के लिए सही नहीं है.ऐसे बहुत से कारण है जिनके बारे मैं यदि लिखा जाए तो ब्लोगर पुराण लिखा जा सकता है. लेकिन क्या अधिक टिप्पणी पाना एक अच्छे लेख , अच्छी कविता या अच्छे ब्लोगर की पहचान है? शायद नहीं.कुछ लोग हिंदी मैं न लिख पाने के कारण भी टिप्पणी नहीं करते.
मैंने एक दो ब्लोगर को देखा अभी १०-१५ दिनों मैं "अमन का पैग़ाम" ब्लॉग की किसी पोस्ट की टिप्पणी संख्या को मुद्दा बनाया. वो कहां तक सही हैं या ग़लत हैं अपने अनुमान मैं , यह तो वक़्त ही बताएगा. लेकिन अधिक टिप्पणी पाने का शौक और श्रीमती टिप्पणी जी से उनका इश्क उनके वाद विवाद से अवश्य ज़ाहिर हो गया और उनका खुशामदी मिजाज़ भी सब की समझ मैं आ गया.
अक्सर मैं भी लोगों से कहता हूँ भाई आपने नयी पोस्ट पढी लेकिन इसका कारण यह नहीं होता की मुझे पाठकों की कमी है बल्कि यह हुआ करता है की जिन लोगों ने "अमन का पैग़ाम" पे लेख भेजा है, कविता कही है ,या समाज मैं अमन और शांति की लिए समय दिया है उनका उत्साह बढाओ. वरना जो इज्ज़त "अमन के पैग़ाम" को इसके पाठकों ने दी है वो बहुतों की नसीब मैं नहीं होती . आज "अमन के पैग़ाम" से पेश की गयी एक कविता या लेख ३०-३५ टिप्पणी के बावजूद २५० से ९०० लोगों द्वारा हर दिन पढी जाती हैं. इसी कारणवश मैं हर २४ घंटे मैं लेख बदल दिया करता हूँ.
यह बात शायद बहुत से ब्लोगर को सच न लगे या जो "अमन के पैग़ाम" के खिलाफ फ़ोन और मेल से दुसरे ब्लोगर को गुमराह कर रहे हैं उनके लिए एक नया हथियार बन जाए. इन बातों से बचने के लिए मैं आप को कल की अपने ब्लॉग की stat की तस्वीर पेश कर रहा हूँ.
और एक सवाल उन ब्लोगर महाशय से कर रहा हूँ जो न जाने किन किन तरीकों "अमन के पैग़ाम: के खिलाफ बे बुनियाद अफवाहें फैला के लोगों को टिप्पणी करने से रोक रहे हैं.क्या आप की सारी कोशिश "अमन के पैग़ाम" के पाठकों को कम कर सकी? याद रखें "अमन और शांति" के साथी बहुत हैं, कुछ आपकी खुशनूदी मैं टिप्पणी किये बिना जा तो सकते हैं लेकिन लेख पढ़ते अवश्य है.
मेरा निवेदन है सभी से की आप उनसभी ब्लोगर का उत्साह बढाएं जो " अपने लेख या कविता के द्वारा समाज मैं शांति की बात कर रहे हैं. "अमन का पैग़ाम" के इतने पाठक होने का श्रेय इसको लेख भेजने वालों को जाता है. आप लेख और कविताएँ भेजते रहे अधिक से अधिक लोगों तक आप की मेहनत को पहुचना मेरा काम.
मुझे यकीन है की एक दिन आएगा जब सभी ब्लोगर इस "अमन के पैग़ाम: की अहमियत को समझेंगे और इस काम मैं सहयोग देंगे.
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1956), पद्मश्री (1961), पद्मभूषण (1968), पद्म विभूषण (1980), तालार मौसीकी, ईरान गणतंत्र (1992), फेलो ऑफ संगीत नाटक अकादमी (1994), भारत रत्न (2001) सहित बहुत से पुरस्कार बिस्मिल्लाह खान को मिले. उस समय ऐसा लगता था की पुरस्कार देने वाली संस्थाएं बिस्मिल्लाह खान को पुरस्कार दे के आपका क़द ऊंचा कर रही हैं. यह थी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का व्यक्तित्व .
यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे की जब हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ तो देश की फ़िजाओं में 15 अगस्त 1947 को गंगा के घाट के इस लाल के शहनाई की धून दिल्ली के लाल किले से गुंजने लगी, लोग भाव-विभोर होकर झुमने लगे थे. 26 जनवरी 1950 को जब देश में पहला गणतंत्र दिवस मनाया गया तो उस समय भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अनुरोध पर गंगा के घाट के इस लाल की शहनाई दिल्ली के लाल किले से गुंज उठी थी.
| ZEAL said... मासूम जी, यदि सभी लोग आप की तरह सोचने लगें तो फिर कोई समस्या ही नहीं बचेगी। लेकिन अफ़सोस वाह-वाही लूटने के लिए भाईचारे की पोस्ट लगाना और वास्तव में दिल में भाई-चारा रखना दोनों में बहुत अंतर हैं। मैंने एक से एक नमूने यहीं ब्लॉग पर देखे हैं जो प्रेम की अलख जलाये घूम रहे हैं। और खुद गोल-मोल पोस्ट लिखकर दूसरों के खिलाफ भड़ास निकालते हैं। आपने चूँकि निवेदन किया था यहाँ आकर अपने विचार रखूं। इसलिए सच ही लिख रही हूँ। वर्ना " बेहतरीन पोस्ट " लिख कर चली जाती हूँ, जहाँ मेरा विचार भिन्न होता है। डरती हूँ ब्लोगर्स से। जिसे देखो वही चिढ़ा बैठा है। इसलिए किसी की पोस्ट पर सच लिखकर क्या फ़ायदा। ज़रा सी भूल चुक हुई नहीं की चिट्ठाजगत पर दस पोस्टें दिव्या के खिलाफ होंगी। और लोग बुरा मानकर आना बंद कर देंगे हैं सो अलग। लोग जितनी दरियादिली पोस्टों में दिखाते हैं, उतने होते नहीं हैं। बात-बात पर बुरा मानने वाले बहुतायत में हैं यहाँ । इसलिए दिल खोल कर लिखने से मैं भी डरती हूँ दूसरों के लेख पर। अपना ब्लॉग ही ठीक है अपने मन की बात कहने के लिए। आभार। यदि आपको मेरी बात बुरी लगे , तो बेहिचक टिपण्णी डिलीट कर दीजियेगा। ……. इस ईद का यह दिन बुराई पे नेकी की फतह का दिन है और शांति और इंसानियत की कोशिश से बेहतर कौन सी नेकी हो सकती है? --- सहमत हूँ आपसे । इंसानियत से बढ़कर , कुछ भी नहीं। |
