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Tuesday, January 18, 2011

इन्सान की तीस गलतियां


1. इस ख्याल में रहना कि जवानी और तन्दुरुस्ती हमेशा रहेगी।

2. खुद को दूसरों से बेहतर समझना।

3. अपनी अक्ल को सबसे बढ़कर समझना।

4. दुश्मन को कमजोर समझना।

5. बीमारी को मामुली समझकर शुरु में इलाज न करना।

6. अपनी राय को मानना और दूसरों के मशवरें को ठुकरा देना।

समाज मैं रहते हुए मिल के काम करने मैं क्या फाएदा है यह आप इस चित्र से समझ सकते हैं..


समाज  मैं रहते हुए मिल के काम करने मैं क्या फाएदा  है यह आप इस चित्र से समझ सकते हैं, जो मुझे आज किसी ने मेल किया
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Sunday, January 16, 2011

अर्चना चावजी की जादुई आवाज़ का कमाल


archana_chaoji[3][26]ज़रा इधेर भी देखें  "अमन के पैग़ाम पे पेश किये गए लेखों और कविताओं  का youtube पे अर्चना चावजी की जादुई आवाज़  मैं  कमाल .
मैं अर्चना जी का शुक्र  गुज़ार हूँ कि उन्होंने अपनी जादुई आवाज़ हमारे सहयोगी ब्लोगर्स के लेखों और कविताओं  को दी , और अब आप 'अमन का पैग़ाम" केवल पढ़ें ही नहीं सुनें भी.
विडियो देखने और अर्चना जी को सुनने के लिए "अमन का पैग़ाम" के sidebar के विडियो को देखें.

अर्चना चावजी की आवाज़ का जादू देखिये अमन के पैग़ाम पे पेश किये गए लेखो के साथ.
ब्लॉगजगत एक परिवार लेकिन सावधानी हटी दुर्घटना घटी

Monday, January 10, 2011

बच्चे उदारता को अपने माता- पिता से सीखते हैं।

www.amankapaigham.com बच्चे सभी को प्यारे लगते हैं परन्तु यदि वे उदार भी हों तो और अधिक अच्छे लगने लगते हैं।
क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने बच्चे की कन्जूसी पर चिन्तित हुए हों? और आप ने यह सोचा हो कि इसे किस प्रकार उदार बनाया जा सकता है? विशेषकर कि जब आप स्वंय उदारवादी हों।


अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे उदारता को अपने माता- पिता से सीखते हैं। जो बच्चे उदार परिवार में बड़े होते हैं वे निश्चित रूप से यह सीख लेते हैं कि किस प्रकार अपने मित्रों या सहकर्मियों के साथ उदारता पूर्ण व्यवहार करें और दूसरों की सहायता करें और किसी की धन सम्पत्ति पर निगाहें न गाड़े। यध्यपि आज के स्वार्थी और क्रूर विश्व में हम मनुष्यों को अपनी विभूतियों का मूल्य ज्ञात होना चाहिए परन्तु उनको ग़रीब लोगों के साथ बॉंट कर हम जीवन का अधिक आनन्द उठा सकते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि हम इस स्वार्थी विश्व में अपने बच्चों को किस प्रकार से दयालु और उदार बना सकते हैं?
यद्यपि वर्तमान युग में बच्चों को यह सिखाना बहुत कठिन है परन्तु असम्भव नहीं है।उदार और अपनी चीज़े दूसरों को देने वाले बच्चे केवल अपने हित के बारे में ही नहीं सोचते बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों तथा मित्रों को भी महत्व देते हैं। इन बच्चों ने सीखा है कि उदारता तथा भलाई से दूसरों को हर्ष प्राप्त होता है। बच्चों को उदारता सिखाने के लिए माता – पिता को चाहिए कि बचपन से ही उन्हें सामूहिक जीवन का महत्व बताएं और उन्हें यह बताएं कि कोई भी मनुष्य जीवन में अकेला नहीं रह सकता। जब भी कोई भलाई करता है तो न केवल यह कि वो स्वंय को पहले से अधिक सक्षम पाता है बल्कि उसमें आत्म सम्मान की भावना भी पनपती है। अधिकॉंश बच्चे लगभग ३ वर्ष की आयु से ही अपनी समरस्ता तथा दया की भावना का प्रदर्शन करने लगते हैं।
यही वो समय है कि जब बच्चा उदारता की भावना को सीखता है।उदार तथा दयालु बच्चे शीघ्र यह सीख लेते हैं कि अपने खाने की वस्तुओं, कपड़ों तथा खिलौनों को अपनी आयु के दूसरे बच्चों के साथ बाटना चाहिए। इस प्रकार वे मित्रता तथा सामाजिक संबंधों को विकसित करते हैं। अलबत्ता याद रखिए कि जो चीज़ें बच्चों को बेहद प्रिय हैं उन्हें दूसरों को देने पर उन्हें कभी विवश न करें।


अधिकांश बच्चे अपनी चीज़ों को दूसरों के साथ बॉंटने में रूचि रखते हैं परन्तु यदि स्वंय इसके लिए पहल करें तो हमें उनकी सहायता करनी चाहिए।सभी बच्चे स्वाभविक रूप से एक विशेष आयु में अपने खिलौने तथा चीज़ें दूसरों को नहीं देते हैं। इस लिए उस समय तक धीरज रखिए जब अचित समय आ पहुंचे। अधिकॉंश लोग यह समझते हैं कि बच्चे ३,४ वर्ष की आयु तक बहुत से मामलों को ठिक से नहीं समझते हैं।


साधारणत: १८ महीने से कम के बच्चे अपनी चीज़ें दूसरों को दे देते हैं परन्तु फिर उसे वापस ले लेते हैं। वस्तुत: इस आयु में बच्चों को अपनी चीज़ों में दूसरों को भागीदार बनाने के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता। आप उसके हाथ में चीज़ें दें और उसे वापस लेकर बच्चे की प्रतिक्रिया देखें। बच्चा जैसे ही स्वामित्व का अर्थ समझ लेगा अपनी चीज़ वापस नहीं करे गा। यदि अपने बच्चे से पूछे बिना आप अपने बच्चे के खिलौने अपने अतिथि के बच्चे को दे देंगे तो उसे बहुत बुरा लगेगा। परन्तु यही काम यदि उससे पूछ कर और उसकी इच्छा से किया जाए तो बच्चा एक प्रकार के अमिभान का आभास करेगा और प्रसन्न होगा।
बच्चे धीरे धीरे दूसरों की भावनाओं तथा स्नेह को समझने लगते हैं और उनका सम्मान करते हैं। परन्तु उद्देश्य पूर्ण तथा सुव्यवस्थित प्रशिक्षण द्वारा उनमें शिष्टाचारिक गुणों का पोषण किया जा  सकता है।

Friday, January 7, 2011

श्रीमान पोस्ट और श्रीमती टिप्पणी का रहस्य

श्रीमती टिप्पणी से इश्क ब्लोगर के लिए कोई नया नहीं है और इसके इश्क मैं बड़े बड़े बेकार  बर्बाद हुए. श्रीमती टिप्पणी जी के ऊपर बड़े लेख लिखे जा चुके हैं और ब्लॉग जगत इसकी चाहत मैं न जाने क्या क्या क्या क्या करता रहता है. कुछ ब्लोगर तो साफ़ साफ़ कहते हुए मिले की जब वो खुद ५० लोगों के ब्लॉग पे जा के टिप्पणी कर आते हैं तब कहीं जा के ४० टिप्पणी का इंतज़ाम खुद की पोस्ट के लिए हो पाता है.

यह भी सत्य है की एक से एक बेहतरीन लेख इस ब्लॉगजगत मैं केवल २-४ टिप्पणी ही पाते हैं और कुछ जगहों पे एक फूहड़ पोस्ट SMS JOKE की १२५ टिप्पणी पा जाया करती है.मैंने सुना था की पैसा  पैसे को खींचता है और सच भी यही है ठीक उसी तरह से यह भी पाया की टिप्पणी टिप्पणी को खींचती है. क्यों की कुछ ऐसे भी ब्लोगर मैं जो दूसरों की नजर मैं आने के लिए वहां टिप्पणी कर आते हैं जहाँ अधिक लोग टिप्पणी कर रहे हैं. 

इस असंतुलन का  कारण  मुझे यह दिखा  की एक ब्लॉगजगत मैं वो लोग हैं जो सच मैं लिखते बहुत अच्छा हैं लेकिन उनके पास या तो इतना समय  नहीं या उनकी पहुँच नहीं उतने ब्लोगर तक की वो वहाँ जा के टिप्पणी करें. ऐसे मैं उनके ब्लॉग पे भी लोग टिप्पणी नहीं करते.दुसरे वोह लोग हैं जिनके पास समय भी है, और कम से कम १५-२० ऐसे ब्लोगर को वो पहचान गए हैं, जो रोजाना ब्लॉगजगत मैं घुमते हैं. इनके लिए कुछ भी लिखके ५० टिप्पणी का इंतज़ाम करना बड़ा आसान हुआ करता है.

यहाँ यह अवश्य कह दूं कि समूह बना के टिप्पणी करना एक अच्छा काम है, रिश्ते अच्छे बनते हैं लेकिन इन रिश्तों का इस्तेमाल दुसरे ब्लोगर के खिलाफ करना निंदनीय है. 

यह असंतुलन शायद ब्लॉगजगत की तरक्की के लिए सही नहीं है.ऐसे बहुत से कारण है जिनके बारे मैं यदि लिखा जाए तो ब्लोगर पुराण लिखा जा सकता है.  लेकिन क्या अधिक टिप्पणी पाना एक अच्छे लेख , अच्छी कविता या अच्छे ब्लोगर की पहचान है? शायद नहीं.कुछ लोग हिंदी मैं न लिख पाने के कारण भी टिप्पणी नहीं करते. 

मैंने एक दो ब्लोगर को देखा अभी १०-१५  दिनों मैं "अमन का पैग़ाम" ब्लॉग की  किसी पोस्ट की टिप्पणी संख्या को मुद्दा बनाया. वो कहां तक सही हैं या ग़लत हैं अपने अनुमान मैं , यह तो वक़्त ही बताएगा. लेकिन अधिक टिप्पणी पाने का शौक और श्रीमती टिप्पणी जी से उनका इश्क उनके वाद विवाद से अवश्य ज़ाहिर हो गया और उनका खुशामदी मिजाज़ भी सब की समझ मैं आ गया. 

अक्सर मैं भी लोगों से कहता हूँ भाई आपने नयी पोस्ट पढी लेकिन इसका कारण यह नहीं होता की मुझे पाठकों की कमी है बल्कि यह हुआ करता है की जिन लोगों ने "अमन का पैग़ाम" पे लेख भेजा है, कविता कही है ,या समाज मैं अमन और शांति की लिए समय दिया है उनका उत्साह बढाओ. वरना जो इज्ज़त "अमन के पैग़ाम" को इसके पाठकों ने दी है वो बहुतों की नसीब मैं नहीं होती . आज "अमन के पैग़ाम" से पेश की गयी एक कविता या लेख ३०-३५ टिप्पणी के बावजूद २५० से ९००  लोगों द्वारा हर दिन पढी जाती हैं. इसी कारणवश मैं हर २४ घंटे मैं लेख बदल दिया करता हूँ.

यह बात शायद बहुत से ब्लोगर को सच न लगे या जो "अमन के पैग़ाम" के खिलाफ फ़ोन और मेल से दुसरे ब्लोगर को गुमराह कर रहे हैं उनके लिए एक नया हथियार बन जाए. इन बातों  से बचने के लिए मैं आप को कल की अपने ब्लॉग की stat की तस्वीर  पेश कर रहा हूँ.

stat

और एक सवाल उन ब्लोगर महाशय से कर रहा हूँ जो  न जाने किन किन तरीकों  "अमन के पैग़ाम: के खिलाफ बे बुनियाद अफवाहें फैला के लोगों को टिप्पणी करने से रोक  रहे हैं.क्या आप की सारी कोशिश "अमन के पैग़ाम" के पाठकों  को कम कर सकी? याद रखें "अमन और शांति" के साथी बहुत हैं, कुछ आपकी खुशनूदी मैं टिप्पणी किये बिना  जा तो सकते हैं लेकिन लेख पढ़ते अवश्य है. 

मेरा निवेदन है सभी से की  आप उनसभी ब्लोगर का उत्साह बढाएं जो " अपने लेख या कविता के द्वारा समाज मैं शांति  की बात कर रहे हैं. "अमन का पैग़ाम" के इतने  पाठक होने का श्रेय इसको लेख भेजने वालों को जाता है. आप लेख और कविताएँ भेजते रहे अधिक से अधिक लोगों तक आप की मेहनत  को पहुचना मेरा काम.

मुझे यकीन है की एक दिन आएगा जब सभी ब्लोगर इस "अमन के पैग़ाम: की अहमियत को समझेंगे और  इस काम मैं  सहयोग  देंगे.

Thursday, January 6, 2011

कुत्ते ही बता पायेंगे इंसान से न पूछो

javed आज हमारे दोस्त शायर जावेद बदायुनी साहब का एक शेर देखा. उसमें कुछ ऐसा दिखा की दिल चाहा आप सब के साथ बाँट लिया जाए.
कुत्ते  ही  बता  पायेंगे  इंसान  से  न  पूछो
पोशीदः  किसी  गोशेह  में  बम   है  के  नहीं  है

जावेद  बदौनी
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श्रीमान पोस्ट और श्रीमती टिप्पणी का रहस्य

Tuesday, January 4, 2011

चलो बनारस की सैर करें भाग एक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का कई साल  मेरा साथ रहा है. जब मैं वाराणसी मैं पढता था तो अक्सर दालमंडी मैं उनके घर आना जाना हुआ करता था. आज कुछ उनके बारे मैं..

२१ मार्च १९१६ में जन्में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम उनके अम्मा वलीद ने कमरुद्दीन रखा था, पर जब उनके दादा ने नवजात को देखा तो दुआ में हाथ उठाकर बस यही कहा - बिस्मिल्लाह. शायद उनकी छठी इंद्री ने ये इशारा दे दिया था कि उनके घर एक कोहेनूर जन्मा है. उनके वलीद पैगम्बर खान उन दिनों भोजपुर के राजदरबार में शहनाई वादक थे. ३ साल की उम्र में जब वो बनारस अपने मामा के घर गए तो पहली बार अपने मामा और पहले गुरु अली बक्स विलायतु को वाराणसी के काशी विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई वादन करते देख बालक हैरान रह गया. नन्हे भांजे में विलायतु साहब को जैसे उनका सबसे प्रिये शिष्य मिल गया था. १९३० से लेकर १९४० के बीच उन्होंने उस्ताद विलायतु के साथ बहुत से मंचों पर संगत की. १४ साल की उम्र में अलाहाबाद संगीत सम्मलेन में उन्होंने पहली बंदिश बजायी. उत्तर प्रदेश के बहुत से लोक संगीत परम्पराओं जैसे ठुमरी, चैती, कजरी, सावनी आदि को उन्होने एक नए रूप में श्रोताओं के सामने रखा और उनके फन के चर्चे मशहूर होने लगे.१९३७ में कलकत्ता में हुए अखिल भारतीय संगीत कांफ्रेंस में पहली बार शहनायी गूंजी इतने बड़े स्तर पर, और संगीत प्रेमी कायल हो गए उस्ताद की उस्तादगी पर.

 

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का संछिप्त परिचय

संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1956), पद्मश्री (1961), पद्मभूषण (1968), पद्म विभूषण (1980), तालार मौसीकी, ईरान गणतंत्र (1992), फेलो ऑफ संगीत नाटक अकादमी (1994), भारत रत्न (2001) सहित बहुत से  पुरस्कार बिस्मिल्लाह खान को मिले. उस समय ऐसा लगता था की पुरस्कार देने वाली संस्थाएं बिस्मिल्लाह खान को पुरस्कार दे के आपका क़द ऊंचा कर रही हैं. यह थी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का व्यक्तित्व .
यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे की  जब हिन्दुस्तान आज़ाद हुआ तो देश की फ़िजाओं में 15 अगस्त 1947 को  गंगा के घाट के इस लाल के शहनाई की धून दिल्ली के लाल किले से गुंजने लगी, लोग भाव-विभोर होकर झुमने लगे थे. 26 जनवरी 1950 को जब देश में पहला गणतंत्र दिवस मनाया गया तो उस समय भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अनुरोध पर  गंगा के घाट के इस लाल की शहनाई दिल्ली के लाल किले से गुंज उठी थी.

Monday, January 3, 2011

और अंत मैं कुछ सवाल टिप्पणी का.Tippani of the Year 2010. ZEAL.. Part One

मैंने अपनी नव वर्ष की पहली  पोस्ट जो "अमन का पैग़ाम" से पेश की , उसमें कुछ बातें आप सब के सामने रखी " कि  स्वस्थ ब्लोगिंग कैसे संभव है? वहाँ चर्चा भी भी चल रही है सहमती और असहमति की, जो एक अच्छी निशानी है. .


मैंने लिखा था की " टिप्पणी हमेशा आप की बात से सहमती जाता के ही आएगी ऐसी आशा करना ग़लत है. और जिनके विचार आप से न मिलें उनके खिलाफ दिल मैं शिकवा रखना  भी सही नहीं. जब तक आप ऐसा नहीं करेंगे आप के ब्लॉग पे १०० टिप्पणी तो आ सकती हैं लेकिन इमानदारी से की गयी टिप्पणी नहीं आएगी. किसी भी ब्लोगेर की पोस्ट पे अधिक टिप्पणी का आना उसकी कामयाबी की पहचान नहीं बल्कि अधिक इमानदार टिप्पणी का आना उसकी कामयाबी की  पहचान है."
मेरी इस बात को ऐसे समझें की कोई भी  इंसान हमेशा सही या हमेशा ग़लत नहीं हुआ करता. यहाँ तक की ज्ञानी भी बहुत सी बातों मैं  अलग अलग निष्कर्ष पे पहुँच जाते हैं, क्यों की सबका ज्ञान ,अक्ल और तजुर्बा एक सा नहीं हुआ करता. इसलिए असहमति होने पे आप सामने वाले कि बात का न तो बुरा मानें और न ही उसको कुछ बुरा भला कहें.

 
टिप्पणी कम हो और लेख  पढ़ के की गयी हो तो उसका महत्व अधिक है, फिर चाहे वो सहमती हो या असहमति कोई अंतर नहीं पड़ता. 
लेख पढ़ के इमादारी से टिप्पणी करने वालों कि उत्साह को बढ़ाने के लिए मैंने यह फैसला  लिया  है की हर सप्ताह या महीने ; सब से बेहतरीन टिप्पणी को ,उसके ब्लॉग और तस्वीर के साथ अपने लेख के साथ  पेश करूंगा. 
इसका मतलब हुआ की हर सप्ताह किसी एक ब्लोगेर की टिप्पणी की चर्चा और तारीफ  "अमन के पैग़ाम" से होगी.
आज की चर्चा दिव्या जी की एक बहुत ही सुंदर टिप्पणी है.जिसका  मैं साल २०१० कि सबसे अधिक पसंद कि गयी इमानदार  टिप्पणी मैं शुमार  करता हूँ.

ZEAL said...
 मासूम जी,
यदि सभी लोग आप की तरह सोचने लगें तो फिर कोई समस्या ही नहीं बचेगी। लेकिन अफ़सोस
zeal-2तो ये है की आप जैसी सोच वाले विरले ही हैं। इसलिए हर तरह की आवाजें बुलंद होती है। हर तरफ मार-काट, अपने धर्म के लिए लड़ाई देखकर अलग-अलग व्यक्ति के मन में भिन्न-भिन्न विचार आते हैं और लोग उसे व्यक्त करते हैं।
वाह-वाही लूटने के लिए भाईचारे की पोस्ट लगाना और वास्तव में दिल में भाई-चारा रखना दोनों में बहुत अंतर हैं।
मैंने एक से एक नमूने यहीं ब्लॉग पर देखे हैं जो प्रेम की अलख जलाये घूम रहे हैं। और खुद गोल-मोल पोस्ट लिखकर दूसरों के खिलाफ भड़ास निकालते हैं।
आपने चूँकि निवेदन किया था यहाँ आकर अपने विचार रखूं। इसलिए सच ही लिख रही हूँ। वर्ना " बेहतरीन पोस्ट " लिख कर चली जाती हूँ, जहाँ मेरा विचार भिन्न होता है।
डरती हूँ ब्लोगर्स से। जिसे देखो वही चिढ़ा बैठा है। इसलिए किसी की पोस्ट पर सच लिखकर क्या फ़ायदा। ज़रा सी भूल चुक हुई नहीं की चिट्ठाजगत पर दस पोस्टें दिव्या के खिलाफ होंगी। और लोग बुरा मानकर आना बंद कर देंगे हैं सो अलग।

लोग जितनी दरियादिली पोस्टों में दिखाते हैं, उतने होते नहीं हैं।
बात-बात पर बुरा मानने वाले बहुतायत में हैं यहाँ । इसलिए दिल खोल कर लिखने से मैं भी डरती हूँ दूसरों के लेख पर। अपना ब्लॉग ही ठीक है अपने मन की बात कहने के लिए।
आभार।
यदि आपको मेरी बात बुरी लगे , तो बेहिचक टिपण्णी डिलीट कर दीजियेगा।
…….
इस ईद का यह दिन बुराई पे नेकी की फतह का दिन है और शांति और इंसानियत की कोशिश से बेहतर कौन सी नेकी हो सकती है? 
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सहमत हूँ आपसे । इंसानियत से बढ़कर , कुछ भी नहीं।

शायद दिव्या जी की इस टिप्पणी के बाद आप सभी को यह समझ मैं आ गया होगा की अधिकतर ब्लोगर इमानदारी से टिप्पणी करने की जगह  सौजन्‍यता वश टिप्‍पणी करके अपनी उपस्थिति दिखा के क्यों निकल जाते हैं. और हम इसको अपनी कामयाबी मान के बेवकूफों की तरह टिप्पणी गिन गिन के खुश होते रहते हैं..
इसका हल हमारे ही पास है. लेख लिखो और इमादारी से चर्चा करो.सहमती या असहमति चर्चा का एक अंश है ,दोनों स्थिति मैं टिप्पणी करने वाले का शुक्रिया  अदा करो. 
असहमत होने पे इस बात का ध्यान  अवश्य ध्यान रखे  की  असहमति का स्तर गिरा हुआ न हो
इस पोस्ट पे टिप्पणी की आवश्यकता नहीं , क्योंकि यहाँ कोई चर्चा नहीं हो रही. हाँ किसे प्रकार की आपत्ति होने पे टिप्पणी की जा सकती है..